सीकर न्यूज़, Sikar News in Hindi, Sikar Local News

Today News//तीतर या बटेर के शिकार पर पाबंदी है, लेकिन पालने पर नहीं, तीतर पालन से कमा सकते हैं लाखों

तीतर पक्षी देश के सभी हिस्सों में पाया जाता है. लेकिन इसके शिकार पर पाबंदी हैं. इसकी वजह यह है कि यह पक्षी लगातार दुर्लभ होता जा रहा है. यह मुख्यत: घास के मैदानों, खेतों के आस-पास, शुष्क खुले जंगलों में, रेतीले टीलों के पास देखा जा सकता है. यह पक्षी ज्यादा लंबी उड़ान नहीं भर सकते. छोटी उड़ान भर कर घास, झाड़ियों या फसलों में छुप जाता है. यह जब उड़ता है तो इसके पंखों की आवाज सुनाई देती है. हमारे आस-पास यह अरहर के खेतों में मिल जाता है.

जोड़ा निभाते हैं तीतर, नर करता है घोसले की रखवाली

यह पक्षी जोड़ा बना कर पूरे प्रजनन के समय एक ही साथी के साथ रहता है. जमीन पर झाड़ियों के नीचे अपना घोंसला बनाते हैं.

मादा पक्षी 4 से 9 तक अंडे देती है. अंडों से बच्चे निकलने तक नर पक्षी घोंसले के आस-पास रह कर शिकारी पक्षी या जानवर पर नजर रखता है.

जब भी कोई शिकारी घोंसले की तरफ आता है यह शोर मचा कर उसे खदेड़ देता है. अंडों से निकलने के बाद चूजे कुछ समय बाद ही भोजन शुरू कर देते हैं. तीतर अपने घोंसले को बहुत जल्द छोड़ देते है तथा चूजों को खेतों के आस-पास ले जाते हैं, जहां भरपूर मात्रा में कीट उपलब्ध हो.

 तीतर के चूज़े जल्दी ही उड़ने लगते हैं

आरंभ में कुछ दिनों तक चूजे कीट ही खाते है. 15 दिनों के बाद चूजे उड़ान भरने लगते हैं. चूजों के बाहर आने के बाद यह अन्य परिवारों के साथ समूह में रहते हैं. ये सर्दियों तक एक साथ रहते हैं तथा जनवरी माह में नया जोड़ा बना लेते हैं.

तेजी ये घट रही है संख्या तीतर की

संख्या तेजी से घट रही है. इसका शिकार भी संख्या घटने का मुख्य कारण है.इसके अतिरिक्त खेतों में कीटनाशकों का प्रयोग, मशीनों का चलन भी संख्या घटने का कारण है. कीटनाशकों के प्रयोग के कारण चूजों को भरपूर मात्रा में कीट नहीं मिल पाते.

तीतर के शिकार करने पर दो साल की सज़ा हो सकती है.

भारत में इसके शिकार पर प्रतिबंध है. वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत इसका शिकार दंडनीय अपराध है. तीतर का शिकार करने पर दो वर्ष की कैद या 25 हजार रुपये जुर्माना या दोनों भी हो सकते है.

तीतर पालन

तीतर या बटेर पालन के लिए मुख्य रूप से फराओ, इग्लिस सफेद, कैरी उत्तम, कैरी उज्जवल, कैरी श्वेता, कैरी पर्ल व कैरी ब्राउन की जापानी नस्लें हैं. शीघ्र बढ़वार, अधिक अंडे उत्पादन, प्रस्फुटन में कम दिन सहित तत्कालिक वृद्धि के कारण यह व्यवसाय का रूप तेजी से पकड़ता जा रहा है.

वर्ष भर के अंतराल में ही मांस के लिए बटेर की 8-10 उत्पादन ले सकते हैं. चूजे 6 से 7 सप्ताह में ही अंडे देने लगते हैं. मादा प्रतिवर्ष 250 से 300 अंडे देती है. 80 प्रतिशत से अधिक अंडा उत्पादन 9-10 सप्ताह में ही शुरू हो जाता है. इसके चूजे बाजार में बेचने के लिए चार से पांच सप्ताह में ही तैयार हो जाते हैं. एक मुर्गी रखने के स्थान में ही 10 बटेर के बच्चे रखे जा सकते हैं. इसके साथ ही रोग प्रतिरोधक होने के चलते इनकी मृत्यु भी कम होती है. इन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बटेर को किसी भी प्रकार के रोग निरोधक टीका लगाने की जरूरत नहीं होती है. एक किलोग्राम बटेर का मांस उत्पादन करने के लिए दो से ढाई किलोग्राम राशन की आवश्यकता होती है. बटेर के अंडे का भार उसके शरीर का ठीक आठ प्रतिशत होता है जबकि मुर्गी व टर्की के तीन से एक प्रतिशत ही होता है.