co-education will bring medal and trophy | को-एड में एडमिशन दिलाएगा मेडल और ट्रॉफी


16 घंटे पहलेलेखक: निशा सिन्हा

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  • को-एजुकेशन वाले स्टूडेंट का रिजल्ट सिंगल जेंडर की तुलना में बेहतर
  • 2018 और 2019 दोनों साल को-एड के स्टूडेंट्स रहे बेस्ट
  • क्लास की लड़कियों के कारण लड़के अव्वल

इजरायल में हुई एक स्टडी कहती है कि अगर क्लास में ज्यादा लड़कियां हो, तो उस क्लास के दोनों जेंडर एकेडमिक रूप से अच्छा परफॉर्म करते हैं। सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े क्लास के स्टूडेंट्स पर यह और भी पॉजिटिव असर डालता है। ऐसे में अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार का फरमान आया है कि लड़के-लड़कियों के बीच परदा लगाकर पढ़ाई करवाई जाए. साथ ही कई और अजीबोगरीब बातें भी कही गई हैं. ऐसे फैसलों ने एक बार फिर को-एजुकेशन सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं? तो क्या को-एजुकेशन बच्चों को भटकाता है, या फिर इसके फायदे ज्यादा हैं?

बढ़ी लड़कियों की साक्षरता दर
जहां तक भारत की बात है, तो 2011 और 2021 के बीच महिला साक्षरता ने पुरुष साक्षरता की तुलना में जोरदार जंप लिया है। नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस के डेटा के अनुसार, 2011 में भारत में महिला साक्षरता करीब 64.6 प्रतिशत थी, तो 2017 में यह बढक़र 70.3 प्रतिशत हो गयी। जबकि पुरुषों में यह दर 2011 में 80.9 प्रतिशत थी, जो 2017 में 84.7 प्रतिशत तक पहुंची। साफ तौर पर यह देखा जा सकता है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों का एजुकेशन ग्राफ चढ़ा है। इसका क्रेडिट समाजिक, आर्थिक और मानसिक ढ़ांचे में सही दिशा में हुए पॉजिटिव बदलाव को जाता है।

को-एड में एडमिशन से मिलेगी कामयाबी
अब आते हैं कि कैसे को-एजुकेशन से पूरी की पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ा. तो साल 2019 के दिल्ली बोर्ड के परिणाम को देखने बाद यह पाया गया कि को-एजुकेशन वाले स्कूलों में पढ़नेवाले स्टूडेंट्स का रिजल्ट उन स्कूलों की तुलना में ज्यादा अच्छा रहा, जो लड़के या लड़कियों के लिए अलग से चलाए जा रहे थे। उस साल को-एड स्कूलों में जहां पास पर्सेंटेज 80.46 था, वहीं लड़कियों में यह 73.71 और लड़कों के स्कूल में 66.09 प्रतिशत पाया गया। साल 2018 में भी दिल्ली बोर्ड के को-एड स्कूलों का रिजल्ट 79.64 प्रतिशत था, जो उस साल के सिंगल जेंडर स्कूल्स के रिजल्ट से बहुत ही बेहतर था। लगातार दो सालों का यह रिजल्ट इस बात को पुख्ता कर रही है कि को-एजुकेशन में बच्चे अच्छा परफॉर्म करते हैं।

आगे चलकर भी होता है फायदा
दिल्ली के गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. महेश वर्मा का मानना है कि को-एजुकेशन सिस्टम एक ऐसी व्यवस्था है, जो लड़के और लड़की को बराबरी का मौका देता है। एक जमाने में लड़कियों के एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए अलग से स्कूल और कॉलेज बनाए गए जैसे दिल्ली का लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज। इसमें केवल लड़कियों को ही दाखिला दिया जाता था ताकि उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बढ़े। लेकिन अब ऐसा नहीं है। वे बताते हैं, “जब मैं मौलाना आजाद डेंटल कॉलेज में डीन था, तो वहां 70-80 प्रतिशत लड़कियां आती थी जबकि लड़के केवल 20 से 30 प्रतिशत होते थे।” डॉ. महेश वर्मा भी यह मानते हैं कि समाज में स्त्री और पुरुष सभी साथ मिल कर रहते हैं इसलिए को-एड जैसा सिस्टम संपूर्ण विकास के लिए जरूरी है। लिंग के आधार पर शिक्षा संबंधी भेदभाव आज के माहौल में लॉजिकल नहीं लगता क्योंकि बाद में ऑफिस में दोनों जेंडर साथ ही काम करते हैं। फिर लोगों की यह सोच भी गलत है कि को-एजुकेशन सिस्टम में सेक्सुअल अब्यूज या छेड़खानी जैसी चीजें ज्यादा होती है। को-एजुकेशन के साथ जुड़े रहने का मेरा अपना अनुभव इस तथ्य को सपोर्ट नहीं करता है।”

हमेशा सेफ भी नहीं को-एड
साइकोलॉजिस्ट का मानना है कि इस बात को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है कि को-एड में अब्यूज की तरह की घटनाएं नहीं होगी। कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट पल्लवी जोशी के अनुसार, “को-एजुकेशन का लक्ष्य था कि स्कूल और कॉलेज खत्म होने के बाद दोनों जेंडर जिंदगी के चैलेंज को आपसी समझदारी से सामना करें। पर चौकन्ना रहने की जरूरत तो हैं, कुछ चीजों को इंडिकेटर की तरह लिया जाना चाहिए, जैसे सोशल मीडिया साइट्स पर वीडियोज और फोटोज में स्कूल स्टूडेंट्स आपत्तिजनक हरकतें करते दिखते हैं। कम उम्र में बढ़ रहे अर्बाशन रेट भी हमें चौकन्ना करते हैं, इसलिए को-एजुकेशन के साथ-साथ दूसरे फैक्टर्स को नकारा नहीं जा सकता। हालांकि इसमें शक नहीं कि साथ पढ़ने से बच्चे दूसरे जेंडर के प्रति सेंसिटिव होते हैं। यह आगे चलकर फायदा भी पहुंचाता है। ग्रीक फिलॉसफर प्लेटो ने बहुत पहले ही कहा था कि को-एजुकेशन से भाईचारे की भावना बढ़ती है। उन्होंने यह भी कहा था पुरुष और महिला को एक ही संस्थान में बिना किसी भेदभाव के शिक्षा दी जानी चाहिए।

क्या कहते हैं शिक्षाविद
दिल्ली में ,एनडीएमसी स्कूल में डिप्टी एजुकेशन ऑफिसर और पूर्व में प्रिंसिपल रह चुके दिनेश कुमार तंवर का मानना है कि को-एड में अब्यूज के भी कुछ मामले देखने को मिलते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि सिंगल जेंडर स्कूल्स के बच्चों को उस तरह की घटनाओं से दूर पाया गया है। यानी दुर्घटनाएं दोनों ही तरह के स्कूलों में होती हैं, फिर चाहे वो को-एड हों या फिर लड़के-लड़कियों का अलग हो। कुछ स्कूली बच्चे परिसर से बाहर गलत हरकत करते पाए जाते हैं, इसमें सिंगल जेंडर स्कूल्स के बच्चे भी होते हैं। इसलिए को-एड को ही हमेशा अब्यूज जैसी घटनाओं को लेकर ब्लेम नहीं किया जा सकता है।

सिनचैन के स्कूल में साथ पढ़ते हैं दोनों जेंडर
दुनियाभर में पॉपुलर जापानी कार्टून शो डोरेमॉन में नोबिता और सुजुका एक-दूसरे से होमवर्क में मदद लेते हैं। जापान के ही एक अन्य मशहूर बच्चों के शो सिनचैन में भी सिनचैन और नैनी एक साथ पढ़ते हैं। इंडियन कार्टून शो लिटिल सिंघम में बबली और अजय एक ही टीचर से पढ़ते हैं। शायद ही कोई ऐसा किड्स शो हो जहां लड़कों और लड़कियों के लिए सिंगल जेंडर एजुकेशन सिस्टम दिखाया जा रहा है। मकसद है एक ऐसे समाज का निर्माण जहां, पुरुष और महिला बिना भेदभाव अच्छा और प्रगतिशील समाज बनाएं,जिसकी नींव बचपन में ही रखी जा सकती है।

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