Dependence on the opinions and decisions of others is harmful for the future, timely protection is necessary. | दूसरों की राय व फैसलों पर निर्भरता भविष्य के लिए नुकसानदायक है, समय रहते बचाव ज़रूरी है


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डॉ. राहुल राय कक्कड़, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, नारायणा सुपरस्पेशेलिटी हॉस्पिटल, गुरुग्राम4 घंटे पहले

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  • कुछ लोग दूसरों की राय के आधार पर ही फैसले लेते हैं, जो कि आगे चलकर उनकी स्वतंत्र सोच को प्रभावित करके निर्भरता को बढ़ाता है।
  • अपनी कोई राय ना बनाकर, केवल दूसरों की राय से चलने की आदत से समय रहते छुटकारा पाना ज़रूरी है।

व्यक्तिगत या सामाजिक कारणों से हरेक व्यक्ति की एक दूसरे पर निर्भरता कम या ज़्यादा हो सकती है। लेकिन आम जीवन में ऐसे लोग भी मिलते हैं जिन्हें अपनी हर राय बनाने से पहले ही दूसरों से एक प्रकार की स्वीकृति चाहिए होती है। इन्हें अपने निजी व सामाजिक जीवन में ख़ुद फैसले लेने में भी समस्या आती है। वे अंतिम निर्णय के लिए भी अपने किसी मित्र या अन्य क़रीबी की सलाह चाहते हैं। ऐसी आदत का नुकसान यह होता है कि ये लोग सदा के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं, अपनी कोई राय कभी बना नहीं पाते, असफल होने या ग़लत कर देने का डर इन्हें इतना सताता है कि आत्मविश्वास खो बैठते हैं। इस आदत में परिवर्तन कैसे लाया जा सकता है, जानिए इस लेख में।

सबसे पहले यह समझें कि आम जीवन में अक्सर ऐसे पल आते हैं जब व्यक्ति वाकई कोई निर्णय ले पाने में असमर्थ होता है या घबराया हुआ होता है और उसे किसी अन्य व्यक्ति की राय लेना विविध कारणों से उचित लगता है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व ही दूसरों की राय पर टिक जाए तो निश्चित रूप से समस्या वाली बात है। बहुत मुमकिन है ऐसे लोग डीपीडी (डिपेंडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर) का शिकार हों, इसकी पुष्टि केवल मनोचिकित्सक ही कर सकते हैं। लेकिन इसके बारे में मौलिक जानकारी होना भी ज़रूरी है।
क्या है डीपीडी
दरअसल यह एक प्रकार का अकेले रहने की असमर्थता का डिसऑर्डर है। ऐसे लोग हर बात पर दूसरों की सलाह पर तो निर्भर होते ही हैं, उसके साथ-साथ वे दूसरों के आस-पास न होने भर से ही एक प्रकार की एंग्जायटी और असुरक्षा का भाव महसूस करते हैं। यदि वे कोई निर्णय ले भी लें तो एक बार किसी अन्य व्यक्ति की सहमति के बाद ही आश्वस्त महसूस करते हैं।
ऐसे लोगों में
असहमतियों का डर।
अकेले छोड़ दिए जाने का भय।
असहमतियों से तुरंत आहत होना।
लगातार एंग्जायटी, तनाव जैसे तमाम लक्षण देखे जा सकते हैं।
डीपीडी के कारण
हालांकि इसके एकदम सटीक कारणों के बारे में नहीं कहा जा सकता, लेकिन अतीत के कड़वे अनुभव, लम्बे समय तक अपमानजनक व्यवहार की स्थिति में रहना, अभिभावकों द्वारा बचपन से ओवरप्रोटेक्टिव यानी अतिसंरक्षित व्यवहार, प्रताड़ना-भरे संबंधों का लम्बा अनुभव इसके कारणों में शामिल हैं।
क्या है इलाज
मनोचिकित्सक इसे मरीज़ की हिस्ट्री के अध्ययन और लक्षणों के आधार पर डायग्नोज़ करते हैं और रोग की गंभीरता के अनुसार इलाज की दिशा तय करते हैं। दवाओं व थैरेपी में इसके समाधान निहित हैं। लेकिन सबसे ज़रूरी पहलू है इसे ठीक समय पर पहचानना और इलाज शुरू हो जाना, नहीं तो जीवनपर्यंत यह समस्या बनी रह सकती है, और वक़्त बीतने के साथ गंभीर हो सकती है।

कैसे ख़ुद की मदद करें

अपने व्यवहार पर नज़र रखें, उनमें होते बदलावों पर ध्यान दें। इसके अलावा व्यवहारिक जीवन में निर्णय ख़ुद न ले पाने की स्थिति में भी कुछ कदम समाधान की ओर ले जा सकते हैं। जैसे —  छोटे-छोटे निर्णयों से शुरुआत करें। भोजन में आज कौन से व्यंजन बनेंगे, कौन से रंग के पर्दे घर में लगेंगे, किस वक़्त बाहर सैर पर जाना उचित होगा आदि जैसे निर्णयों को लेना शुरू करें, या इनमें अपनी भागीदारी मुखर रूप से रखें।  मानसिक समस्या की स्थिति में यह कदम उतना कारगर नहीं है लेकिन व्यवहारिक जीवन में अस्वीकृति या नामंज़ूरी से आहत होने से बचें, क्योंकि हरेक व्यक्ति की राय व अनुभव अलग होते हैं।  हर व्यक्ति की राय अलग होती है इसलिए अपने दृष्टिकोण से सबको अवगत करवाने से बचें। सबका अपना जीवन है और उन्हें उसमें आनंदित महसूस करने का हक़ है। यह भी मुमकिन है कि आपका हित न चाहने वाले आपसे जुड़ी बातों का आपके विरुद्ध इस्तेमाल करें।  धूम्रपान, शराब या नशीले पदार्थों से विशेष दूरी बनाएं। अक्सर तनाव की स्थिति में इनमें समाधान खोजा जाता है जो बिलकुल भी उचित नहीं है।  छवि धूमिल होने से ज़्यादा अपने व दूसरों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति गंभीरता दिखाएं।  एकांत में समय बिताने की कोशिश करें। इसकी भी आदत धीरे-धीरे विकसित करें। ख़ुद के साथ वक़्त बिताएं। यदि ऐसी स्थिति में अत्याधिक असहज या विचलित महसूस करें तो विशेषज्ञ से सलाह लें।  यदि उपरोक्त के बावजूद दूसरों की स्वीकृति पर निर्भरता या तनाव की स्थिति बनी रहती है तो बिना झिझक मनोचिकित्सक से सलाह लें। मानसिक समस्याओं को शुरुआती स्तर पर पहचानें और आने वाले जोखिम से बचें।

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