green energy waste management green belt movement chipko movement environment plastic renewable oecd | कुल जमीन की 2 फीसदी की मालकिन, पर भरती हैं 80 फीसदी पेट, धरती का भी रखती हैं ख्याल


नई दिल्ली36 मिनट पहलेलेखक: दिनेश मिश्र

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  • कार्बन एमिशन में कमी लाने में आगे हैं महिलाएं
  • वस्तुओं की रिसाइकिल में करती हैं ज्यादा यकीन
  • रिन्युएबल एनर्जी का कर रही हैं भरपूर इस्तेमाल

महिलाएं घर-परिवार सहेजने के साथ ही अपनी धरती को हरा-भरा रखने के लिए खूब जतन करती हैं। आदतन वे पानी की बर्बादी कम करती हैं और सोलर एनर्जी के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही हैं। राजस्थान से लेकर उत्तरप्रदेश की महिलाओं ने अपनी कोशिशों से इस बात को साबित कर दिया है। वे बहुत पढ़ी लिखी नहीं, मगर सोलर एनर्जी ने उनके चूल्हे चौके और घर-अहाते में पैठ बना ली है। ऐसी बहुत सी महिलाएं दुनिया में ग्रीन एनर्जी की अगुवा बन रही हैं और इसके सोर्स जैसे सूर्य, पानी, हवा का बेहतरीन इस्तेमाल कर रही हैं। वे कार्बन इमिशन में कमी लाने और रिन्युएबल एनर्जी की राह पर चल पड़ी हैं। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएन वुमन के आंकड़ों के मुताबिक, ये महिलाएं दुनिया की 60-80 फीसदी तक की आबादी का पेट भरती हैं, जबकि, वे पूरी दुनिया की जमीन की बस दो फीसदी हिस्से की ही मालकिन हैं। वह भी तब जब बात पर्यावरण को बचाने की हो।

पुरुषों से ज्यादा संवेदनशील
कई सर्वे बताते हैं कि महिलाएं पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर पुरुषों के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील हैं। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाएं किसी वस्तु के दोबारा इस्तेमाल, कम से कम कचरा करना और शुद्ध खानपान पर ज्यादा ध्यान देती हैं। यही नहीं, वह आने जाने में भी ऊर्जा का कम इस्तेमाल करती हैं और आम तौर पर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना ज्यादा पसंद करती हैं। वहीं, महिलाओं के मुकाबले पुरुष भारी भरकम जीवनशैली के चलते औसतन तीन गुना कर्जदार होते हैं। इससे भी पर्यावरण को ज्यादा बोझ सहना पड़ता है।

सोर्स: ओईसीडी

सोर्स: ओईसीडी

वेस्ट मैनेजमेंट में बन रहीं रोल मॉडल
एक रिसर्च द रोल ऑफ जेंडर इन वेस्ट मैनेजमेंट के मुताबिक, भारत, इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम में वेस्ट मैनेजमेंट में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं। वे वेस्ट प्रॉसेसिंग इंडस्ट्री, रिसाइकिल इंडस्ट्री, स्क्रैप डीलिंग बिजनेस में काम कर रही हैं। हालांकि, इस दौरान उन्हें स्वास्थ्य समस्याओं से भी जूझना पड़ता है।

गांवों की 6.5 करोड़ महिलाएं बन रहीं अगुवा
केंद्र सरकार करीब 6.5 करोड़ महिलाओं से जुडे़ ऐसे सेल्फ हेल्प ग्रुप को मदद कर रही है, जो गांवों में सिंगल यूज प्लास्टिक का या तो बेहद कम इस्तेमाल कर रही हैं, या फिर ऐसे प्लास्टिक की रिसाइकिल कर रही हैं।

पर्यावरण अनुकूल फैसले लेने में पुरुषों से आगे
थिंक टैंक गेटवे हाउस, मुंबई के सीनियर फेलो अमित भंडारी कहते हैं, ग्रीन एनर्जी हो या कम से कम प्लास्टिक का इस्तेमाल, स्त्रियां किसी भी वस्तु के ज्यादा से ज्यादा प्रयोग में यकीन रखती हैं। कुछ भी हो, मगर अपने तौर-तरीके और रहन-सहन में ये पुरुषों के मुकाबले पर्यावरण अनुकूल ज्यादा हैं। 1992 के संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन में कहा गया था कि विकसित देशों की महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कार्बन इमिशन में बेहद कम योगदान करती हैं। ज्यादातर महिलाएं ऐसे फैसले लेती हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल हो।

चिपको आंदोलन हो या ग्रीन बेल्ट मूवमेंट, सभी जगह छोड़ी छाप
भारत में चाहे पेड़ों को बचाने की खातिर चर्चित चिपको आंदोलन हो या फिर अफ्रीकी देश केन्या का ग्रीन बेल्ट मूवमेंट हो, पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के खिलाफ महिलाएं ही खड़ी हुई हैं। उत्तराखंड के चमोली जिले से 1973 से शुरू हुए इस आंदोलन ने पूरे प्रदेश में पर्यावरण को बचाने की दिशा में एक नई इबारत लिख दी थी। हालांकि, इसकी शुरुआत 1970 में मशहूर पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, गोिवंद सिंह रावत, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरादेवी की अगुवाई में हुई थी। गौरा देवी के नेतृत्व में 2400 पेड़ों को बचाने के लिए रेणी गांव की 27 महिलाओं ने जान की बाजी लगा दी थी।

ब्रिटेन में सर्वे, महिलाएं रिसाइकिल में 10 फीसदी आगे
ब्रिटेन में अप्रैल, 2018 में रिसाइकिल को लेकर एक सर्वे किया गया। इसके मुताबिक, रिसाइकिल में सबसे आगे महिलाएं ही हैं। 77 फीसदी महिलाओं ने, जबकि 67 फीसदी पुरुषों ने वस्तुओं का रिसाइकिल किया। पानी के कम इस्तेमाल के मामले में भी 30 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 38 फीसदी महिलाएं आगे हैं। वहीं, जब घर पर जब कोई नहीं होता तो 58 फीसदी पुरुष एनर्जी पैदा करने वाले उपकरणों को बंद करते हैं, जबकि यही बात महिलाओं के मामले में 64 फीसदी है। हालांकि, इस तरह के सर्वे भारत में नहीं किए गए हैं, मगर बात जब महिलाओं की हो तो ब्रिटेन के इस सर्वे से कुछ अनुमान तो लगाया ही जा सकता है।

सोर्स: ओईसीडी

सोर्स: ओईसीडी

प्लास्टिक मुक्त मुहिम में भी आगे
प्लास्टिक फ्रीडम और पैकेज फ्री शॉप नाम की दो लोकप्रिय ऑनलाइन रिटेलर कंपनियों का कहना है कि उनके 90 फीसदी ग्राहक महिलाएं हैं। ये कंपनियां बांस और उससे बने हुए उत्पादों और कागज व लकड़ी से बनी वस्तुओं को बेचती हैं।

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