Jagannath Swami celebrates the angry mother Lakshmi, after traveling to Bahuda, then God returns to the temple | जगन्नाथ स्वामी मनाते हैं रूठी हुईं मां लक्ष्मी को, बाहुडा यात्रा कर फिर मंदिर में लौटते हैं भगवान


2 घंटे पहले

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  • आषढ़ महीने के शुक्लपक्ष की द्वितिया को जगन्नाथ रथयात्रा होती है और देवशयनी एकादशी पर बहुड़ा यात्रा

12 जुलाई से भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा का शुभारंभ हुआ था। 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव का समापन बाहुडा यात्रा से होता है। इस यात्रा से भगवान वापस अपने मंदिर में लौटते हैं। ये बाहुडा यात्रा कई परंपराओं के साथ 20 जुलाई को आयोजित होगी।

लक्ष्मी जी को मनाया जाता है
जगन्नाथ पुरी के पंडित डॉ. गणेश मिश्र बताते हैं कि हेरा पंचमी की एक परंपरा में भगवान को ढूंढते हुए देवी लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर जाती हैं, किसी बात से गुस्सा होकर भगवान के रथ का एक पहिया तोड़कर श्रीमंदिर चली आती हैं, द्वादशी के दिन श्रीमंदिर में लक्ष्मी जी के निर्देश से द्वैतापति दरवाजा बंद कर देते हैं। फिर भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी जी को मनाकर मंदिर में प्रवेश करते हैं।

खोले जाते हैं मंदिर के द्वार
आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की दसवीं तिथि को सभी रथ पुन: मंदिर की ओर लौटते हैं। इस रस्म को बाहुडा कहते हैं। श्रीमंदिर लौटने पर द्वादशी के दिन मंदिर के द्वार खोलकर प्रतिमाओं को पुन: विराजमान किया जाता है। इस दौरान देवी-देवताओं को स्नान करवाकर मंत्र उच्चारण द्वारा विग्रहों को पुन: प्रतिष्ठित किया जाता है।

मौसी के घर भी ठहरते हैं
जगन्नाथ मंदिर से शुरू हुई यात्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचती है। गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा सात दिनों तक विश्राम करते हैं। इस मंदिर में भगवान के दर्शन आड़प दर्शन कहलाते हैं। माना जाता है कि लौटते वक्त भगवान की मौसी का घर पड़ता है, जहां रुककर वे पोर पिठा खाते हैं फिर आगे बढ़ते हैं।

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