John Bolton, America’s security adviser, said – 9/11 will now be considered a symbol of open rivalry between America-China-Russia, Allied countries have lost faith in America | बोले – 9/11 को अब अमेरिका-चीन-रूस के बीच खुली प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक माना जाएगा, मित्र देशों का अमेरिका से विश्वास डिगा है


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8 मिनट पहले

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पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन बता रहे हैं कैसे बदली दुनिया की राजनीति। - Dainik Bhaskar

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन बता रहे हैं कैसे बदली दुनिया की राजनीति।

9/11 अब अमेरिका-चीन-रूस के बीच खुली प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक माना जाएगा। आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त मोर्चा दोबारा बनाने की जरूरत पड़ेगी। ये कहना है 2018-19 में अमेरिका के सुरक्षा सलाहकार रहे जॉन बोल्टन का। अमेरिका पर आतंकी हमले के 20 साल पूरे होने और अफगानिस्तान से फौज वापसी के बाद पैदा हुए हालात पर उन्होंने भास्कर के रितेश शुक्ल से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं संपादित अंश…

अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने के बाद 9/11 व आतंकवाद के खिलाफ मोर्चे का क्या मतलब है?
दुनिया से आतंकवाद का खतरा टला नहीं है। 9/11 के कारण अमेरिका अफगानिस्तान में घुसा था और 20 साल बाद इसी दिन को टारगेट मान कर निकला है। अब ये दिन अमेरिका-चीन-रूस के बीच खुली प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक माना जाएगा। चीन मिडिल ईस्ट में दखल बढ़ाएगा। वहीं रूस सेंट्रल एशिया में गतिविधियां तेज कर पूर्वी यूरोप में दबदबा बढ़ाएगा।

क्या चीन-रूस को आतंकवाद का खतरा नहीं?
सही मायनों में इनके लिए अवसर ज्यादा है। अमेरिका के कदम से उसके कई मित्र देशों का विश्वास डिगा है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर चीन-रूस उन देशों के साथ अब सैन्य करार कर पाएंगे। सऊदी अरब और रूस के बीच सैन्य समझौता हाल ही में हुआ ही है।

अमेरिका तालिबान के लिए हथियार छोड़ कर चला गया। क्या ये तालिबान से दोस्ती का प्रतीक नहीं है?
जो हथियार छूटे वो अफगानिस्तान की सेना को दिए गए थे। चाह कर भी अमेरिका उसे वापस नहीं ला सकता था। अफगानी सेना ही असलहे की रक्षा नहीं कर पाई। ये चूक है, रणनीति नहीं।

क्या ऐसी चूक अमेरिका के रणनीति तंत्र पर सवालिया निशान नहीं लगाती है?
बिलकुल। राष्ट्रपति आते-जाते हैं लेकिन सुरक्षा और खुफिया तंत्र लगातार चलता रहता है। अफगानिस्तान में हमारा तंत्र फेल हो गया है।

आपके अनुसार इसका जिम्मेदार कौन होगा?
चूक तभी संभव है, जब नई सरकार को पिछली सरकार से स्पष्ट रूपरेखा न मिले। नई सरकार जल्दी में कदम उठाती है तो गलतियां होती हैं।

तो क्या आप ट्रंप को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं?
ट्रंप ने बतौर राष्ट्रपति घोषणा की थी कि वे अफगानिस्तान से सेना हटाएंगे। लेकिन पॉलिसी के स्तर पर उन्होंने कुछ नहीं किया। अगर कुछ होता तो समय के अनुसार फेरबदल करके नई सरकार उसे अमल में लाती। बाइडेन ने जल्दबाजी की, ये उनकी गलती है।

क्या संस्थागत तौर पर जिम्मेदारी तय करने की कोई प्रक्रिया है?
सितंबर और अक्टूबर में कांग्रेस बैठेगी। सेना और खुफिया तंत्र के उच्च अधिकारियों से ब्योरा लिया जाएगा। ट्रंप से लेकर बाइडेन सरकार में इस निर्णय को लेकर क्या हुआ सारी बातों पर खुल कर चर्चा होगी और वो आम जनता में प्रदर्शित किया जाएगा। खूब कीचड़ उछलेगा और कई लोग मैले होंगे।

भारत के लिए आप क्या कहेंगे?
अब सबकुछ चीन के लिहाज से कहा-सुना जाना चाहिए। बाइडेन ने कहा कि वो चीन से बेहतर तरीके से लड़ने के लिए अफगानिस्तान से बाहर हुए हैं। क्या माना जाए अमेरिका ताइवान में अपनी सेना तैनात करेगा? अगर नहीं तो चीन से लड़ेगा कैसे? शी ऐसा नहीं मानते। वो इस खालीपन को अवसर मानकर ताइवान से लेकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक भारत समेत अन्य देशों को घेरेंगे। ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी चीन ही है। वो तब भी बना रहा जब ईरान पर प्रतिबंध था। दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर और अरब सागर में चीन का वर्चस्व बढ़ेगा। मतलब साफ है, भारत घिरा हुआ महसूस करेगा।

भारत को अब क्या करना चाहिए?
भारत को अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ वियतनाम जैसे देशों के साथ सुरक्षा संबंध गहरे करने ही होंगे। क्वाड का विस्तार भारत के पक्ष में है। आतंकवाद और चीन से लड़ने के लिए भारत का तेजी से संपन्न और शक्तिशाली होना अनिवार्य है। सायबर वाॅरफेयर में भी भारत को मुस्तैदी दिखाने की जरूरत है।

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