Lord Ganesha is the first worshiper, he is also the lord of all living beings, so take the divine inspirations from the form, speech and pastimes of Mangalmurti and make life blissful. | गणेशजी प्रथम पूज्य हैं, समस्त जीव-जातियों के स्वामी भी हैं, इसलिए मंगलमूर्ति के स्वरूप, वाणी और लीलाओं से मिलने वाली दिव्य प्रेरणाओं को ग्रहण करें और जीवन को आनंद-मंगलमय बनाएं


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डॉ. विवेक चौरसियाएक दिन पहले

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गणेश समस्त जीव-जातियों के ईश अर्थात स्वामी हैं। गणेश शब्द का एकमात्र यही अर्थ है। यही कारण है कि गणेशजी सनातन संस्कृति के सभी 33 कोटि देवताओं में सबसे पहले पूजे जाते हैं। वेदों से स्मृतियों तक और महाकाव्यों से पुराणों तक भारतीय वाङ्मय में गणेशजी की स्तुति और लीलाओं का कीर्तन हुआ है। उनके जीवन से जुड़ी छोटी से छोटी कथा हमें अपने जीवन को संवारने के बड़े पाठ पढ़ाती है और उनसे जुड़े प्रतीक अमूल्य संकेतों से हमारा जीवन-पथ प्रकाशित करते हैं।

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

गणेश पुराण में श्रीमद्भगवद्गीता की तरह ग्यारह अध्यायों की गणेश गीता सुलभ है। इसमें श्रोता राजा वरेण्य को सम्बोधित करते हुए विघ्नहर्ता गणेशजी ने ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया है। गणेश कहते हैं, ‘अन्न से ही प्राणी जीवन धारण करते हैं। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ से उत्पन्न होती है और कर्म की उत्पत्ति यज्ञ से होती है। कर्म ( यज्ञ ) ब्रह्मा से उत्पन्न होता है और ब्रह्मा मुझसे उत्पन्न होते हैं। इस कारण हे राजन्! आप इस यज्ञ और विश्व में स्थित मुझे ही जानिए। मैं ही विश्वरूप हूं।’ यह कथन साक्षात गणेशजी के श्रीमुख से कहा गया है, जिसका संकेत है कि यह समूचा विश्व गणेशजी की भांति ही विशालकाय और मंगल स्वरूप है। जो प्रत्येक वस्तु और प्राणी को सत दृष्टि व सद्‌भाव से देखता है वह अनायास ही न केवल मंगल का साक्षात्कार करता है अपितु जीवन और जगत को भी मंगलमय अनुभव करता है। इस अर्थ में गणेशजी सिखाते हैं कि जगत जैसा है वैसा ही रहेगा। बस अपनी दृष्टि मंगलपूर्ण रखो तो सारी सृष्टि मंगलमय ही प्रतीत होगी।

लक्ष्य के लिए अनथक श्रम

गणेश जी सृजन और कर्म के देवता हैं। विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत का लिप्यंकन गणेशजी ने ही किया था। प्रजापिता ब्रह्मा जानते थे कि संसार में एकमात्र गणेश ही हैं जो बग़ैर त्रुटि के महाभारत का लेखन करने में महर्षि वेदव्यास के सहायक हो सकते हैं। आदिपर्व की कथा कहती है कि गणेशजी ने प्रकट होकर कार्य तत्काल स्वीकार कर लिया किंतु एक शर्त रखी।

कहा, ‘यदि लिखते समय मेरी लेखनी क्षण भर के लिए भी न रुके, तभी मैं इस महाग्रन्थ का शब्दांकन कर सकता हूं। अंततः ऐसा ही हुआ और गणेशजी ने न केवल महाभारत की दोष रहित रचना पूरी की बल्कि विश्व के पहले आशुलिपिक भी सिद्ध हुए।

ऐसा करके हमें सीख दी कि जब कोई बड़ा काम हाथ में लो तो तब तक विराम न लो, जब तक लक्ष्य की सिद्धि न हो जाए। अनथक श्रम से ही महान लक्ष्य प्राप्त होते हैं, आलस्य से नहीं।

चार भुजाओं में चार पुरुषार्थ

गणेश जी का गजमुख, वक्रतुण्ड, एकदंत, लम्बोदर स्वरूप तो दिव्य है ही, उनकी चार भुजाओं में भी पुरुषार्थ चातुष्टय का सार छुपा है। उनकी चार भुजाओं में पाश, अंकुश, वरदहस्त तथा अभयहस्त हैं। पाश राग का तथा अंकुश क्रोध का संकेत है। इस अर्थ में गणेश पाश द्वारा भक्तों के पापों को बांधकर अंकुश से उनका नाश करते हैं। उनका वरदहस्त भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करता है और अभयहस्त सम्पूर्ण भयों से रक्षा करता है। पुराणों के अनुसार, गणेशजी ने ही देवता, मानव, नाग व असुर इन चारों को स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में स्थापित किया था। उनके चार हाथ चार प्रकार के इन प्राणियों के सम्यक विभाजन के संकेतक हैं। इसी प्रकार चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। गणेशजी दुष्टों का नाश कर सज्जनों की रक्षा के परम धर्म के पर्याय हैं।

वे अर्थ सिद्ध अर्थात रिद्धि-सिद्धि से सम्पन्न हैं। गृहस्थ होकर वे काम को सार्थक करते हैं तथा आनंददाता होकर मोक्ष के प्रदाता हैं। उनके चतुर्भुज का प्रतीक है कि मनुष्य जब चारों पुरुषार्थ साधता है तभी सच्चे अर्थों में उसका जीवन सार्थक होता है।

जल तत्व के अधिपति

सनातन संस्कृति में पंच देवताओं की उपासना है। ये सभी पांच देव सृष्टि के कारक पंच महाभूतों से सम्बद्ध हैं। शिव पृथ्वी तत्व के देवता हैं, विष्णु आकाश तत्व के, शक्ति अग्नि तत्व की, सूर्य वायु तत्व के और गणेशजी जल तत्व के देवता हैं। इसी कारण शिव की पार्थिव पूजा होती है और शक्ति की उपासना हवन कर की जाती है। विष्णु की आराधना शब्द से होती है। पंचतत्वों में जल सृष्टि का बीज तत्व है। गणेशजी के जल तत्व के अधिपति होने के कारण ही उनकी सर्वप्रथम पूजा का विधान है। विज्ञान भी मानता है कि जल से ही जगत और जीवन की सृष्टि हुई है। जल ही जीवन का आधार है। गणेशजी जल की भांति निर्मल, पारदर्शी और तृप्तिदाता हैं।

इस अर्थ में गणेशजी सिखाते हैं कि जिसका जीवन जल की तरह तरल, सरल, निर्मल और सतत प्रवाहित होता है, वही सबको तृप्त अर्थात सन्तुष्ट कर पाता है।

आनंदमय गृहस्थी के देवता

गणेश जी संसार के इकलौते गृहस्थ हैं जिनकी गृहस्थी में सदैव आनंद ही आनंद है। प्रत्येक मनुष्य की तरह हर देवता की गृहस्थी में कुछ न कुछ खटपट है। यहां तक कि उनके पिता शिवजी से भी उनकी माता पार्वती के यदाकदा लीला स्वरूप रूठ जाने की कथाएं मिल जाती हैं लेकिन गणेशजी की गृहस्थी पूर्णतया खटपट रहित है। उनकी दो पत्नियां रिद्धि व सिद्धि तथा दो पुत्र लाभ व क्षेम हैं। रिद्धि ऐश्वर्य की व सिद्धि सामर्थ्य की प्रतीक हैं। स्वाभाविक है कि जिस गृहस्थ के पास ये दोनों होंगे, उसके घर में विवाद या मतभेद की आशंका समाप्त हो जाएगी।

ठीक इसी तरह उनके पुत्र लाभ, जो प्राप्त नहीं है उसकी प्राप्ति कराते हैं और दूसरे क्षेम, जो प्राप्त हुआ है उसकी रक्षा करते हैं। इस अर्थ में जब संतानें गणेशजी के पुत्रों की भांति आचरण करते हुए अप्राप्त की प्राप्ति कराएं और जो प्राप्त हुआ है उसकी रक्षा भी करें, तो स्वभावतः आनंद की ही वर्षा होगी। संतान लाभ व क्षेम की तरह अनुकूल हो, यह दायित्व माता-पिता का है।

गणेशजी की मोदकप्रियता का प्रतीक ही यह है कि वे सदा अपने घर में मोद अर्थात आनंद का वातावरण रखते हैं, जिसका सीधा सकारात्मक असर संतान पर होता है।

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