No biker club had given me entry now I run lady biking club, I have measured the whole country | लड़की हूं इसलिए किसी बाइक क्लब ने नहीं दी थी एंट्री, आज चलाती हूं लेडी बाइकर क्लब और नाप चुकी हूं पूरा देश


एक दिन पहलेलेखक: सुनाक्षी गुप्ता

  • पहचान छिपाने के लिए हेल्मेट पहनकर खाना पड़ता है खाना।
  • कोलकाता की वो सोलो बाइकर, जिसने 10 साल में घूमा पूरा देश।

मैं राइमा सुमई सरकार, वो बाइक राइडर हूं जो सिर्फ शौकिया तौर पर बाइक नहीं चलाती, बल्कि मेरे दिल में 220 सीसी का इंजन धड़कता है। सोलो ट्रैवल करते हुए कभी लद्दाख का चक्कर लगा आती हूं, तो कभी भारत के 7,500 कोस्टल एरिया का सफर करने अपनी एवेंजर 220 बाइक लेकर निकल पड़ती हूं। कोई भी अड़चन मुझे रोक नहीं सकती, भले ही वो लैंडस्लाइड हो या फिर बर्फीला तूफान।

बात जब पैशन फॉलो करने की आए तो उसे हर कीमत पर पूरा करने वाली लड़की है बंगाल की राइडर राइमा। लड़कों के बाइकिंग ग्रुप में एंट्री न मिलने पर महिला बाइक राइडर्स का अलग क्लब बनाने वाली लड़की है राइमा। सिर्फ ख्वाब देखना ही नहीं उसे पूरा करने के लिए हर हद तक जाने वाली लड़की है राइमा सुमई।

लड़कों के बाइकिंग क्लब में लड़की को देखते ही कर देते थे रिजेक्ट

12 साल की थी जब बाइक चलाना सीखा और उसी दिन मैंने जान लिया था कि मेरा पैशन क्या है, मुझे क्या करना है। पापा की बाइक लेकर पूरे कोलकाता का चक्कर लगाते हुए ही बड़ी हुई। जितने भी दोस्त बने, सभी बाइकिंग से जुड़े लेकिन दिक्कत सिर्फ एक ही जगह आती। शहर के चक्कर लगाने में तो मैं शामिल रहती लेकिन जैसे ही दूसरे शहरों या देश के कोने-किनारे नापने की बात आए, लड़की को कमजोर समझ किनारे कर दिया जाता। बंगाल का ऐसा कोई बाइकिंग क्लब नहीं बचा होगा जिसका मैंने चक्कर नहीं लगाया और वहां इंटरव्यू नहीं दिया, लेकिन हर बार की एक ही कहानी, लड़की को राइडिंग पर कैसे ले जाएं, यही कहकर रिजेक्ट कर दिया जाता।

10 साल पहले की बात है तब देशभर में वुमन बाइकर्स का कोई खास क्लब नहीं था। करीब एक साल मैंने इसी खोज में निकाला और आखिर में जाकर दिल्ली के पाथ फाइंडर्स बाइकिंग क्लब में एंट्री मिली। 12 लड़कों के बीच मैं अकेली फीमेल राइडर बनकर अपनी पहली लद्दाख राइड पर गई। पहली राइडिंग काफी रोमांचक थी और उससे भी अच्छी बात यह थी कि क्लब में लड़की को सिर्फ लड़कीभर नहीं समझा जाता था।

मैं अंदर से काफी खुश थी लेकिन मन में एक कसक बाकी थी कि वुमन बाइकर्स का एक क्लब जरूर होना चाहिए। लद्दाख से वापस आते ही सबसे पहला काम यही किया। 21 साल की उम्र में बंगाल लेडी बाइकर का क्लब बनाया जिसे बाद में लेडी बाइकर का नाम दिया। आज इस क्लब में देशभर से कई वुमन राइडर जुड़ी हुई हैं। आज बंगाल ही नहीं, बल्कि देशभर में वुमन बाइकर के कई क्लब बने हुए हैं, जिन्हें देख मुझे काफी खुशी होती है।

कोस्टल राइड पर राइमा सुमई

कोस्टल राइड पर राइमा सुमई

सोलो बाइकिंग – केरल में वुमन राइडर देख करते थे छेड़खानी, गुजरात में मिला सम्मान

2018 में बंगाल से लेकर गुजरात तक भारत की कोस्ट टू कोस्ट 7,500 किलोमीटर की सबसे लंबी सोलो बाइक राइड की। जिसमें नौ राज्य, बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र से होते हुए गुजरात तक का कोस्टल सफर अकेले तय किया। सफर जितना रोमांचक था उतना ही आश्चर्य से भरा, क्योंकि जैसे- जैसे राज्य बदलते, उस जगह के लिए मेरा नजरिया भी बदलता जाता। कई बार अपनी जान बचाने के लिए जेंडर छुपाना पड़ता तो कई बार ऐसा भी हुआ कि लड़की होने पर मेरी जान बच गई और काफी सम्मान मिला।

कोस्टल राइड करते हुए जब केरल पहुंची तब एक ही दिन में दो ऐसी घटनाएं हुई जिन्हें मैं कभी नहीं भूल सकती। केरल, जिसे देश का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा राज्य होने का दर्जा प्राप्त है और जहां हर चीज की सहूलियत है। वहां दिन के उजाले में मेरे साथ छेड़खानी हुई वो भी एक ही दिन में दो बार। केरल में एक व्यक्ति से पता पूछने के लिए रुकी और जैसे ही उसे मेरी आवाज से लड़की होने का पता लगा, वो मुझे नजरों से स्कैन करने लगा और हाथ पकड़ने व गलत तरीके से छूने की कोशिश करने लगा, मैं फटाफट वहां से भाग निकली। थोड़ी दूर कोची पहुंची तब पुलिस से पता पूछने के लिए रुकी वहां बाइक सवार एक लड़के ने मुझे देख लिया और कुछ देर फॉलो करने के बाद हाथ से इशारा कर बुलाने की कोशिश करने लगा, हालांकि मैं वहां से भी बच निकली। इस तरह की घटना मेरे साथ पहले कभी नहीं हुई थी, जबकि मैं बिहार, झारखंड और ओडिशा के जंगल वाले इलाकों से रात के समय भी अकेले राइड कर चुकी हूं।

ऐसे ही वाकयों के चलते, जब मैं बाइक राइड करती हूं तब खुद को ऊपर से नीचे तक कवर किए रखती हूं। अगर दूर से कोई देखे तो किसी को जेंडर का पता भी न लग सके। अगर रास्ते में किसी से पता या डायरेक्शन भी पूछना होता है तो सिर्फ उन्हीं लोगों से बात करती हूं जिनके पास कोई साधन नहीं हो ताकि वह मेरा पीछा न कर सके।

गुजरात पहुंचने पर द्वारिका से गांधीधाम के रास्ते में एक गांव के पास मेरा एक्सीडेंट हुआ, लेकिन वहां लड़की होने का मुझे फायदा मिला, गांव के लोगों ने काफी मदद की। बाइक एक साइकिल से टकराई थी, जिसमें गांव के ही एक बुजुर्ग सवार थे। मेरा घुटना छिल चुका था और भी कई जगह चोट आई थी, उठने की हालत में नहीं थी। थोड़ी देर बाद खेतों से लोग वहां पहुंचे और मुझे उठाने की कोशिश करने लगे, मेरे बोलने पर जब उन्हें पता लगा कि यह लड़की है, तब वो किनारे हो गए और मेरी मदद के लिए खेत से एक महिला बुलाई गई। गांव वाले गुस्से में थे लेकिन इसके बाद भी मुझे दूसरी बाइक में बिठाकर गांधीधाम के अस्पताल ले गए और इलाज कराया, इतना ही नहीं मेरी बाइक को ठीक कर उसे चलाने लायक बनाया, ढाबे पर आराम करने का इंतजाम किया ताकि मैं आगे का सफर पूरा कर सकूं। हालांकि उनके लिए भी महिला बाइक राइडर को देखना काफी अजीब बात थी और कई लोग घेरा बनाकर सवाल भी पूछ रहे थे लेकिन मुझे उनसे डर नहीं लगा।

हेल्मेट पहनी हुई बाइकर राइमा

हेल्मेट पहनी हुई बाइकर राइमा

पहचान छुपाने के लिए हेल्मेट लगाकर ही खाती हूं खाना

सोलो बाइक राइड पर जाते हुए कोशिश यही रहती है कि कम से कम स्टॉप लिए जाए। अगर रुकना भी पड़े तो सिर्फ पेट्रोल डलवाने के लिए। पहाड़ों में तो कई बार चाय पीने के लिए रुकना हो जाता है लेकिन बाकी सभी जगह अपने साथ खाने का सामान जैसे ड्राई फ्रूट्स आदि साथ लेकर ही चलती हूं। खाना खाने के लिए जगह भी ऐसी चुनती हूं जहां ज्यादा लोग न हों। यहां तक कि सुरक्षा के लिए अपना हेल्मेट भी पूरी तरह से नहीं खोलती, सिर्फ उतना ही हिस्सा खोलती हूं जिससे खाना खाया जा सके। राइडिंग करते समय न ही ज्यादा रुकना, न लोगों से ज्यादा बात करना, न किसी को अपनी पहचान बताना, और जितना हो सके रोशनी में ट्रैवल करना- यही सोलो राइडिंग का मेरा मूल मंत्र है।

अरुणाचल प्रदेश राइड पर जाते हुए लैंडस्लाइड का सामना किया

अरुणाचल प्रदेश राइड पर जाते हुए लैंडस्लाइड का सामना किया

लैंडस्लाइड में फंसी, ट्रक में रात गुजारकर बचाई जान

बाइक राइडिंग का सफर पहाड़ों पर कितना खतरनाक हो सकता है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2019 में अरुणाचल प्रदेश राइड पर एक दोस्त के साथ जाते हुए तेजपुर से तवांग के रास्ते में भयंकर लैंडस्लाइड का सामना करना पड़ा। पहाड़ी रास्ते को आधा पार करते ही लैंडस्लाइड शुरू हो गई। बड़े-बड़े पत्थर पहाड़ से गिरने लगे थे, उस वक्त हेल्मेट आपकी जान बचाने के लिए काफी नहीं होता। इसी बीच आर्मी का ट्रक मिला जोकि रास्ता साफ करने आया था। दोनों उसी में बैठ गए। ट्रक के ऊपर एक बड़ा पेड़ भी आ गिरा। वह दृश्य काफी डरावना था, ऐसा लग रहा था मानो मौत सामने खड़ी हो, लेकिन किसी तरह बच गए और अगले दिन सफर जारी रखा।

एक बार लद्दाख राइड में अकेले जाते हुए एक रात ट्रक में गुजारी थी। रात 11 बजे मोरे प्लेंस से लेह जाने के लिए मौसम सही होने का इंतजार कर रही थी। ठंड के कारण नाक से खून भी निकल रहा था। इस बीच कहीं भी आर्मी कैंप नहीं मिलने पर एक ट्रक में ड्राइविंग सीट पर बैठकर पूरी रात काटी।

आठ सालों में 10 से 12 बार लद्दाख ट्रिप कर चुकी, अस्थमैटिक होने के कारण चार बार लद्दाख ट्रिप में हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा, लेकिन फिर भी सफर जारी रखा। नॉर्थ-इस्ट के चार राज्यों को छोड़ बाइक से पूरे देश का चक्कर लगा चुकी और आगे भी इसी तरह राइड करती रहूंगी।

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